-->


Jai Kisan,Bharat Mahaan


दीक्षांत समारोह

दीक्षांत समारोह
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

.

खत पढ़ों और घर बैठै 9 हजार रूपए महीना कमाओ Read Email & Get Money

My Great Web page

Saturday, June 27, 2009

कैसे मिले सोयाबीन से अधिक उपज

मध्यप्रदेश के किसानों को सोयाबीन उगाने का लगभग 40-50 साल का अनुभव तो हो ही गया है। फिर भी इसकी उपज के हिसाब से मध्यप्रदेश का प्रति हैक्टेयर औसत उत्पादन लगभग एक टन (दस क्विंटल) प्रति हैक्टेयर के आसपास ही झूल रहा है। कारण कुछ किसान यदि इसकी उपज 6 क्विंटल प्रति बीघा ले रहे हैं, तो ऐसे किसान भी हैं जो प्रति बीघा डेढ़ से दो क्विंटल से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। उत्पादन क्षमता में यह फसल कमजोर नहीं है।

इसका उत्पादन 30-35 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक कई जगह लिया जा रहा है। उपज में इस भारी अंतर का कारण जानने के लिए अलग-अलग समय पर अलग-अलग स्थानों पर कुछ सर्वे किए गए। उनसे प्राप्त आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाले गए, जो इस प्रकार हैं-
भूमि का चयन : सोयाबीन की खेती के लिए अधिक हल्की और पर्याप्त मात्रा में चिकनी मिट्टी (क्ले सोइल) दोनों ही भूमियाँ उपयुक्त नहीं होती हैं। इसे मध्यम प्रकार की मिट्टी में बोया जाना चाहिए। हल्की भूमियों में इसकी बहुत जल्द पकने वाली किस्में जैसे एसएस 2, सम्राट, मोनेटा आदि किस्में ली जा सकती हैं, परंतु ये किस्में उपज कम देती हैं।
बीज व खाद को मिलाकर बोया जाना : सोयाबीन के बीज का छिलका पतला और नाजुक होता है। अधिकांश किसान सोयाबीन व डीएपी एक साथ मिलाकर बुवाई करते हैं। क्योंकि बीज, खाद बुवाई यंत्र (सीड कम फर्टि ड्रिल) बहुत कम लोगों के पास है। इससे जब भी जमीन में नमी की कमी और तापमान बढ़ते हैं, तो बीज, खाद के रसायन के संपर्क में आकर खराब हो जाते हैं व अंकुरण कम होने से प्रति इकाई वांछित पौध संख्या नहीं आ पाती है।
बीच उपचार : सोयाबीन में अभी भी अंकुरण के समय रोगों के नियंत्रण के लिए फफूँद रोग नाशक रसायन या जैविक नियंत्रण के लिए प्रोटेक्ट (ट्राइकोडर्मा विरिडि) का तथा नत्रजन स्थिरीकरण के लिए राइजोबियम कल्चर एवं स्फुर घोलक बैक्टीरिया का उपयोग बहुत ही कम किसानों द्वारा किया जा रहा है।
उपयुक्त किस्मों का चयन : राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान केंद्र एवं विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा अलग क्षेत्रों के लिए वहाँ की कृषि जलवायु एवं मिट्टी के लिए अलग किस्मों का विकास किया गया है एवं किस्में समर्थित की गई हैं। उसी के अनुसार सोयाबीन किस्में बोई जानी चाहिए। इन किस्मों का थोड़ा बीज लाकर अपने यहाँ ही इसे बढ़ाकर उपयोग में लाया जा सकता है।
फसल चक्र/अंतरवर्ती फसल : कई जगह लगातार सोयाबीन उगाए जाने के कारण मिट्टी में रोगाणुओं का स्थायी घर बन गया है। इनमें सोयाबीन उगाए जाने पर हर साल फसल रोगों से ग्रसित होती है। ऐसे खेतों में फसल-चक्र या अंतरवर्ती फसल उगाकर खेतों को ठीक किया जाना चाहिए। कुछ रोगों को जुवार फसल बोकर नियंत्रित होते पाया गया है।
पौध संख्या : किसी भी फसल की कुल उपज में प्रत्येक पौधे का योगदान होता है। इसलिए हर एक पौधे के महत्व को समझते हुए फसल की कुल पौध संख्या प्रति हैक्टेयर निर्धारित की जाती है। पौध संख्या का निर्धारण फसल या उसकी किस्म के पौधे के फैलाव के आधार पर किया जाता है। इसके लिए विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में परीक्षण किए जाते हैं। सोयाबीन की कम फैलने वाली किस्मों की कतारों में 30 से 35 व अधिक फैलने व लंबी अवधि वाली किस्मों की कतारों के बीच 40 से 45 सेमी का अंतर रखा जाता है।
एक ही कतार में पौधे से पौधे के बीच 10 से 12 सेमी की दूरी रखी जानी चाहिए। पौधों को अधिक घना रखने से पौधे के निचले भाग तक हवा व धूप नहीं पहुँच पाती है। इसी कारण कीड़े व रोग लगने की आशंका बढ़ जाती है। दूसरे, घने पौधों में नीचे की तरफ फलियाँ कम या नहीं लगती हैं।
खरपतरवार नियंत्रण : खरपतवार नियंत्रण के लिए डोरा या कोल्पा चलाया जाना, नींदानाशक रसायन के उपयोग से बेहतर है। क्योंकि इससे खेत में पलवार हो जाती है, जिससे सतह से नमी की हानि रुक जाती है। इसके अलावा मिट्टी में वायु संचरण भी अच्छा हो जाता है, जो जड़ों के विकास, वृद्धि व पोषक तत्वों के शोषण के लिए महत्वपूर्ण है।
कीट रोग नियंत्रण के उपाय आवश्यकता के अनुसार करें। शेड्यूल नहीं अपनाएँ। हर साल मौसम के अनुसार अलग-अलग कीड़े या रोग और उनके प्रकोप की तीव्रता होती है। अंत में समय पर कटाई से बीज नहीं झड़ते हैं। गहाई में सावधानी से दाने नहीं टूटते हैं।

Read Full Text......

Friday, June 19, 2009

किसानों को मिलेगी नई भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका

मध्यप्रदेश में अब किसानों को पुरानी दो भाग वाली भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका की जगह नई एकीकृत पुस्तिका दी जा रही है। राजस्व राज्यमंत्री :स्वतंत्र प्रभार: करण सिंह वर्मा ने कल यहां सरकारी प्रेस जाकर इस नई एकीकृत भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिकाओं की लागत, कागज की गुणवत्ता, छपाई आदि की जानकारी ली।
उल्लेखनीय है कि किसानों को यह नई एकीकृत भू-अधिकार एवं रिण पुस्तिका मुफ्त वितरित की जा रही है। इससे उन्हें दोहरा लाभ हो रहा है। एक ओर उन्हें इन पुस्तिकाओं के एकीकृत होने से काफी सुविधा हो गई है वहीं इसके प्रकाशन में होने वाली किफायत से शासन पर खर्च का बोझ भी घटा है। अब तक जिलों को 26, 42, 600 नवीन एकीकृत भू.अधिकार एवं ऋण पुस्तिकाएं भेजी जा चुकी हैं।

Read Full Text......

Wednesday, June 17, 2009

सरकारी-निजी मदद के बिना नहीं बन सकती खेती लाभ का सौदा...

किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया ने कहा है कि मध्यप्रदेश में कृषि को लाभ का धंधा बनाने के लिए शासकीय तंत्र के साथ-साथ निजी भागीदारी का योगदान भी जरूरी है। इन दोनों में बेहतर समन्वय के साथ ही इस उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है।

डॉ. कुसमरिया सोमवार को मंत्रालय में 13 कृषि एजेंसियों के साथ हुए एमओयू के बाद कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। यह एमओयू एग्रीकल्चर टेक्नालॉजी मैनेजमेंट एजेंसी के तहत किए गए हैं। आज जिन एजेंसियों के साथ एमओयू हुए हैं उनमें एनआईसीटी, सतपुड़ा विज्ञान सभा, महात्मा गांधी प्रतिष्ठान, समर्पण, एक्सेस डेवलपमेंट, बैफ, सृजन, कार्ड, न्यूसिड, एमसीएम, प्राकृति भारती, केजे एज्यूकेशनल सोयायटी एवं मंथन एनजीओ शामिल हैं।
कुसमरिया ने कहा कि आज के समय में कृषि के क्षेत्र में नए-नए बदलाव आ रहे हैं। इनकी जानकारी किसानों तक पहुंचाया जाना बेहद जरूरी है। उन्होंने मध्यप्रदेश को जैविक प्रदेश बनाने के लिए निजी भागीदारी के साथ शामिल होकर एक निश्चित समय में कार्य किए जाने की जरूरत बताई। कुसमरिया ने कृषि कार्य से जुड़ी महिलाओं को भी शिक्षित किए जाने पर बल दिया।
प्रमुख सचिव कृषि प्रवेश शर्मा ने कहा कि प्रदेश में कृषि के क्षेत्र में प्रायवेट पार्टनरशिप के बहुत अच्छे परिणाम सामने आए हैं। इसी को देखते हुए कृषि विभाग ने 13 और नए करारनामे निजी भागीदारी में किए हैं। कृषि संचालक डीएन शर्मा ने बताया कि इन 19 कृषि एजेंसियों के माध्यम से 16 करोड़ 60 लाख रुपए के कृषि विस्तार सुधार कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया गया है।
अब निजी भागीदारी में प्रदेश के समस्त 313 विकासखण्ड कवर किए गए हैं। इस कार्ययोजना में 921 कृषि पाठशाला, 11 हजार 403 कृषि प्रदर्शन, 55 हजार 150 कृषकों के प्रशिक्षण एवं 32 हजार 510 कृषकों को कृषि अध्ययन भ्रमण कराए जाएंगे। कार्यक्रम में महिला चेतना मंच की प्रभारी और सेवानिवृत्त मुख्य सचिव निर्मला बुच ने कृषि में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी।
कॉल सेंटर में बैठ किसानों के फोन सुनेंगे कृषि मंत्री
कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया अब महीने में एक बार कुछ घंटे किसान कॉल सेंटर में बिताएंगे। इस दौरान वे किसानों के सवाल और जिज्ञासाओं के जवाब देने के साथ ही उनकी शिकायतें भी सुनेंगे। ज्ञात रहे कि कृषि विभाग द्वारा भोपाल में निजी भागीदारी से शुरू किए गए किसान कॉल सेन्टर में प्रतिदिन 14 घंटे टोल फ्री फोन पर किसानों की समस्याओं के जवाब दिए जा रहे हैं।

Read Full Text......

Saturday, June 13, 2009

किसान सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक होता है-कृषि मंत्री

किसान भी स्वयं एक सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक होता है। जो विभिन्न परिस्थितियों के बावजूद संघर्ष करके खेती करता है। नई तकनीक हासिल करने के पहले तक वह खेती से जुड़ी सारी समस्याओं से निपटने के लिए खुद ही उपाय ईजाद करता है। यह बात प्रदेश के कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया ने सागर मे आयोजित कृषि मेले एवं कृषि संगोष्ठी के शुभारंभ पर व्यक्त किए।
स्थानीय रवीन्द्र भवन मे आज से प्रारंभ तीन दिवसीय कृषि मेले मे डॉ० कुसमरिया ने कहा कि पहले कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को रसायनिक खाद के उपयोग की समझाईश दी और अब जैविक खाद के उपयोग का सुझाव दे रहे हैं। उन्होने ने भी माना की रसायनिक खाद जमीन की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर रही है। लेकिन किसानों को चाहिए कि वो इन दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करें।
मप्र सरकार की कृषि को फायदे का सौदा बनाने की नीति सिलसिले मे उन्होने कहा कि जबतक उद्यानिकी, पशुपालन व फलोद्यान को खेती के साथ नहीं जोड़ा जाएगा तब तक यह फायदे का सौदा नहीं बन सकेगी।
कुसमरिया ने कृषि मेलों की उपयोगिता बताते हुए कहा कि ये एक तरह से किसाना पंचायतें हैं जहां किसानों के अनुभावों और विज्ञानिकों द्वारा ईजाद की गई खेती की नर्ह तकनीकि पर एक साथ मंथन किया जाएगा और इस मंथन के नतीजों के आधार पर ही प्रदेश सरकार अपनी नीति निर्धारित करेगी।
समारोह की अध्यक्षता कर रहे सागर के सांसद भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि सिंचाई का रकबा बढ़ाए बना उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकेगा। इस लिहाज से बीना परियोजना बुंदेलखण्ड के लिए वरदान साबित हो सकती है जिसके बन जाने पर इस क्षेत्र मे एक लाख हैक्टेयार भूमि सिंचिंत हो जाएगी।
श्री ठाकुर ने सागर मे करीब 10 साल पहले बंद हुए रतौना डेयरी फार्म को दुबारा शुरू कराए जाने की कृषि मंत्री से गुजारिश की साथ ही रतौना मे विटनरी विश्वविद्यालय खोलने की भी मांग की।
इस मौके पर किसानों ने भी अपने विचार रखे साथ ही कृषि मंत्री ने दुर्घटना बीमा योजना, स्प्रिंकलर योजना व नलकूप योजना के तहत हितग्राहियों को चेक वितरित कर लाभान्वित किया।
सम्मेलन परिसर मे कृषि अभियंत्रिकी, उद्यानिकी और संबंधित विभागों द्वारा अपनी विभागीय योजनाओं पर आधारित प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया है। सम्मेलन मे शामिल हुए किसानों के मनोंरजंन के लिए ग्रामीण लोक कला मण्डलियों और पंचायत एवं सामाजिक न्याय विभाग के कलापथिक दल के कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश किए।

Read Full Text......

ADMARK

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
 
Blog template by mp-watch.blogspot.com : Header image by Admark Studio